पाकिस्तान और कुवैत के रिश्ते सिर्फ डिप्लोमेसी तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश अब अपने संबंधों को एक बिल्कुल नए स्तर पर ले जाने की कोशिश में जुटे हैं। सोशल मीडिया और कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है। वह है दोनों देशों के बीच होने वाली आगामी रक्षा संधि। कुवैत और पाकिस्तान के बीच डिफेंस डील की तैयारी चल रही है। यह महज एक सामान्य समझौता नहीं है। इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक हित छिपे हैं। इसके साथ ही एक बड़े फ्यूल स्टोरेज प्लान पर भी बातचीत अंतिम दौर में है।
लोग अक्सर सोचते हैं कि पाकिस्तान केवल कर्ज के लिए खाड़ी देशों का रुख करता है। यह सोच पूरी तरह सच नहीं है। कुवैत को अपनी सुरक्षा और सैन्य आधुनिकीकरण के लिए अनुभवी जनशक्ति की जरूरत है। पाकिस्तान इसमें उसकी मदद कर सकता है। बदले में पाकिस्तान को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए निवेश और सुरक्षित ईंधन सप्लाई चाहिए। यह सौदा दोनों की रणनीतिक जरूरतों को पूरा करता है। यह एक ऐसा कदम है जो आने वाले समय में मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के समीकरणों को बदल कर रख देगा।
पुराने रिश्तों की नई बुनियाद
पाकिस्तान और कुवैत का सैन्य इतिहास काफी पुराना है। दोनों देशों ने दशकों से एक-दूसरे का साथ दिया है। 1991 के खाड़ी युद्ध के समय को याद करना जरूरी है। जब इराक ने कुवैत पर हमला किया था तब पाकिस्तानी सेना ने कुवैत की धरती को बारूदी सुरंगों से मुक्त कराने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। कुवैत इस उपकार को कभी नहीं भूला। आज जब खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बदल रही हैं तब कुवैत को फिर से एक भरोसेमंद साथी की जरूरत महसूस हो रही है।
इस नई रक्षा संधि के तहत दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। सैन्य खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था को भी कड़ा किया जाएगा। पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि कुवैत अपनी वायु सेना और थल सेना को आधुनिक बनाना चाहता है। पाकिस्तान के पास जेएफ-17 थंडर जैसे लड़ाकू विमान और बेहतरीन मिलेट्री ट्रेनिंग सेंटर्स हैं। कुवैत इन सुविधाओं का लाभ उठाना चाहता है। यह पूरी तरह से दोनों पक्षों की जरूरत पर आधारित सौदा है। इसमें किसी एक का पलड़ा भारी नहीं है। दोनों को एक-दूसरे की सख्त जरूरत है।
फ्यूल स्टोरेज प्लान का पूरा गणित
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प हिस्सा ईंधन भंडारण की योजना है। पाकिस्तान लंबे समय से ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। उसके पास कच्चे तेल को स्टोर करने की क्षमता बेहद सीमित है। दूसरी तरफ कुवैत दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। प्रस्तावित योजना के अनुसार कुवैत पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर फ्यूल स्टोरेज फैसिलिटी विकसित करने में निवेश कर सकता है।
यह प्लान कैसे काम करेगा? इसे समझना बहुत आसान है। कुवैत अपना कच्चा तेल पाकिस्तान में बने इन भंडारों में सुरक्षित रखेगा। इससे कुवैत को दक्षिण एशिया के बाजारों के करीब एक सुरक्षित ठिकाना मिल जाएगा। आपातकाल की स्थिति में पाकिस्तान भी इस तेल का इस्तेमाल अपनी घरेलू जरूरतों के लिए कर सकेगा। यह पाकिस्तान के लिए एक बेहतरीन सुरक्षा कवच की तरह होगा। तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से पाकिस्तान को काफी हद तक राहत मिल जाएगी। आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे इस्लामाबाद के लिए यह किसी लाइफलाइन से कम नहीं है।
क्षेत्रीय ताकतों पर इसका असर
जब भी दो बड़े देश इस तरह की रणनीतिक साझेदारी करते हैं तो पड़ोसी देशों की नजरें उन पर टिक जाती हैं। इस डील का सीधा असर खाड़ी क्षेत्र की राजनीति पर पड़ेगा। ईरान और सऊदी अरब के बीच के समीकरण हमेशा से संवेदनशील रहे हैं। कुवैत अपनी तटस्थ नीति के लिए जाना जाता है। वह किसी भी गुटीय जंग में सीधे नहीं कूदना चाहता। पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाकर कुवैत अपनी आंतरिक सुरक्षा को एक मजबूत ढाल दे रहा है।
भारत की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है। भारत के खाड़ी देशों के साथ बेहतरीन व्यापारिक और रणनीतिक संबंध हैं। कुवैत में लाखों भारतीय काम करते हैं जो वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। हालांकि पाकिस्तान और कुवैत की यह डील मुख्य रूप से द्विपक्षीय सुरक्षा पर केंद्रित है। इसमें किसी तीसरे देश को निशाना नहीं बनाया जा रहा है। फिर भी इस क्षेत्र में सैन्य संतुलन बनाए रखने के लिए हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर नजर रखना सभी बड़ी ताकतों की मजबूरी बन जाता है।
आर्थिक संकट और कुवैती निवेश का सहारा
पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट और महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। ऐसे में केवल रक्षा समझौता पाकिस्तान का पेट नहीं भर सकता। यही कारण है कि इस डिफेंस डील को आर्थिक पैकेजों के साथ जोड़ा जा रहा है। कुवैत इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे में निवेश करने की संभावनाओं को तलाश रही है।
फ्यूल स्टोरेज के अलावा कृषि और आईटी सेक्टर में भी निवेश की बात चल रही है। पाकिस्तान के पास उपजाऊ जमीन और युवाओं की एक बड़ी फौज है। कुवैत को खाद्य सुरक्षा की चिंता हमेशा सताती है। वह पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में निवेश करके अपने लिए अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है। यह डिफेंस डील असल में एक बहुत बड़े आर्थिक सहयोग का प्रवेश द्वार है। अगर यह योजना धरातल पर उतरती है तो पाकिस्तान को अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिल सकता है।
संभावित चुनौतियां और रुकावटें
सब कुछ कागजों पर बहुत अच्छा दिखता है। असल चुनौती इसे जमीन पर लागू करने में आती है। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता हमेशा से विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ा डर रही है। सरकारें बदलने के साथ ही नीतियां बदल जाती हैं। कुवैत के अधिकारी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। वे कोई भी बड़ा निवेश करने से पहले पूरी सुरक्षा और नीतिगत स्थिरता की गारंटी चाहते हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती नौकरशाही की सुस्ती है। पाकिस्तान में प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने में सालों लग जाते हैं। रेड टेपिज्म यानी लालफीताशाही इस डील के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बन सकती है। इसके अलावा सुरक्षा के मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में सक्रिय उग्रवादी गुट विदेशी निवेश के प्रोजेक्ट्स को निशाना बनाते रहे हैं। कुवैत अपनी संपत्तियों और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील है। जब तक पाकिस्तान एक सुरक्षित माहौल का भरोसा नहीं देता तब तक इन योजनाओं की रफ्तार धीमी ही रहेगी।
इस पूरे मामले में दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की टीमें लगातार बैठकें कर रही हैं। ड्राफ्ट तैयार किए जा रहे हैं। शर्तों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। उम्मीद है कि आगामी हफ्तों में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात के दौरान इन समझौतों पर आधिकारिक मुहर लग जाएगी। पाकिस्तान को इस मौके को हाथ से नहीं गंवाना चाहिए। उसे अपनी नीतियों को पारदर्शी और निवेशकों के अनुकूल बनाना होगा ताकि यह डील सिर्फ खबरों तक सीमित न रह जाए बल्कि देश की किस्मत बदलने का जरिया बने।